उलझन

मुखोटों में ऐसे उलझ गए है
की अपना असली चेहरा याद नही
इनका बोझ उठा के इतना धक् गए है
की अब आगे चलने की ताकत नही
कोई आए इन मुखौटों को हटाये
मुझे ख़ुद से मिलवाये
ज़िन्दगी थोड़ी हल्की बनाये
कि कम से कम जिया तो जाए

Comments

Aadi said…
That was a nice first time attempt.... I guess BHU has found its 2nd poetess!!